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Thursday, December 8, 2011

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया / बशीर बद्र

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया 
जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया 

कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के 
दीवाना बे पढ़े-लिखे मशहूर हो गया 

महलों में हमने कितने सितारे सजा दिये
लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया 

तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना 
आईना बात करने पे मज़बूर हो गया 

सुब्हे-विसाल पूछ रही है अज़ब सवाल
वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया 

कुछ फल जरूर आयेंगे रोटी के पेड़ में 
जिस दिन तेरा मतालबा मंज़ूर हो गया

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